लंबी बीमारी में बेहतर असर के लिए दवा भी समय-समय पर बदलते रहें

दवाएं फायदा पहुंचाती हैं लेकिन अगर इसे गलत तरह से लिया जाए तो नुकसान भी उतना ही पहुंचाती हैं। कई बार मरीज के लंबे समय तक दवा लेने के बाद भी उसमें सुधार नहीं देखा जाता है। ऐसे में समय-समय डॉक्टरी सलाह से दवाएं बदलते रहें ताकि रोग पर इसका बेहतर असर दिख सके।

कई तरह से लेते दवाएं
मर्ज की स्थिति के अनुसार दवाएं कई तरह से दी जाती हैं। जैसे इमरजेंसी में आईवी रूट, इंजेक्शन, ओरल डोज के अलावा हृदय के मरीजों में दवा को मुंह में दबाकर रखने के लिए कहा जाता है। ऐसी स्थिति में दवा घुलकर उस हिस्से तक पहुंच जाती है जहां तकलीफ होती है। ओरल मेडिसिन लेने पर ये सबसे पहले आंतों और लिवर में पहुंचती है जहां करीब पंद्रह मिनट इसे गलने में लगता है। इसके बाद खून में घुलकर दिल तक पहुंचती है। इसके बाद ऑक्सीजनयुक्त रक्त के साथ मिलकर उस कोशिका तक पहुंचती है जिसमें तकलीफ होती है। इसका तुरंत असर होने लगता है। वैसे हर दवा का असर करने का समय अलग-अलग होता है। ज्यादातर ऐसी दवाएं दी जाती हैं जिसका असर २४ घंटे या उससे कम समय तक रहे।

दस साल होती रिसर्च
ड्रग कंट्रोलर नियमावली के अनुसार दवा पर दस साल तक फार्मा विशेषज्ञों के शोध के बाद रिपोर्ट सामान्य आने पर रोगियों पर प्रयोग कर क्षमता को जांचा जाता है। सब कुछ सामान्य मिलने पर पोस्ट मार्केटिंग टीम निगरानी करती है ताकि शरीर किसी भी नुकसान से बचा रहे।

ऐसे लें दवा एलोपैथी
दवा हाथ में नहीं ले, इससे संक्रमण होने के साथ उसकी क्षमता कम होती है।
एक से अधिक दवा है तो थोड़े-थोड़े अंतराल पर खाएं। एक साथ ३-४ दवाएं न निगलें।
बच्चों की दवा ऐसी जगह रखें जहां वे न पहुंच सके। दवा समय और डॉक्टरी सलाह से ही लें।


आयुर्वेद
आयुर्वेदिक दवाएं द्रव्य, भस्म और ठोस रूप में दी जाती हैं। द्रव्य और भस्म तेजी से शरीर में पहुंचकर खून में मिलती हैं।
इस पद्धति में मुख्य रूप से दवाएं पानी, दूध, शहद के साथ ली जाती हैं। ऐसा करने से दवा का असर दोगुनी तेजी से होता है।

होम्योपैथी
इन दवाओं का शरीर पर नुकसान नहीं होता है।
इनमें पचास गुना अधिक तेजी के साथ काम कर रोग को जड़ से मिटाने की ताकत होती है।
ये दवाएं सीधे नसों के माध्यम से शरीर में पहुंचती है और बीमार कोशिका को दुरुस्त करती हैं।

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