कहीं आपकी हैल्थ पर तो नहीं हो रहा है टेक्नोलॉजी का अटैक?

अपनी प्रगति और विकास के लिए हम जितना ज्यादा टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रहे हैं, उतना ही इसका विपरीत असर हमारे स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा हैैै। देश-विदेश में कई शोधकर्ताओं ने ऐसी कई मानसिक बीमारियों का पता लगाया है जिसकी वजह इंटरनेट और टेक्नोलॉजी का अत्यधिक इस्तेमाल है।

सेल्फाइटिस
दिनभर में अगर 3 से ज्यादा सेल्फी लिए बिना आपका मन नहीं भरता है तो आप सेल्फाइटिस के शिकार हैं। लंदन की नॉर्टिंघम टेंट यूनिवर्सिटी और तमिलनाडू की त्यागराजार स्कूल ऑफ मैनेजमेंट की रिसर्च में यह बात सामने आई है। रिसर्च के अनुसार सेल्फाइटिस डिसऑर्डर के तीन स्तर होते हैं। पहले स्तर में दिन में 3 से ज्यादा सेल्फी लेने की आदत होना, लेकिन सोशल मीडिया पर पोस्ट न करना। दूसरा सेल्फी सोशल मीडिया पर पोस्ट करना और तीसरा हर समय सोशल मीडिया पर अपनी सेल्फी पोस्ट करना। शोधकर्ताओं का मानना है कि इस समस्या से ग्रसित लोग अपना मूड ठीक करने, अपनी स्वीकार्यता दिलाने और दूसरों से आगे रहने के लिए बार-बार सेल्फी लेते हैं।

फैंटम वाइब्रेशन सिन्ड्रोम
दस में से 9 लोग इस समस्या से ग्रस्त हैं। इसमें लोगों को भ्रम होता है कि जेब या बैग में पड़ा उनका मोबाइल वाइब्रेट कर रहा है। जॉर्जिया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में हुई स्टडी में शामिल 90 प्रतिशत लोगों ने वाइब्रेशन महसूस किया, जो भ्रम मात्र ही था।

नोमोफोबिया
बार-बार फोन चेक करना, फोन के न मिलने पर बेचैनी महसूस करना, मोबाइल के बिना एक सेकेंड भी नहीं रहना जैसे लक्षण नोमोफोबिया की ओर संकेत करते हैं। इसी तरह फोमो यानी फियर ऑफ मिसिंग आउट, भी एक बीमारी है जिसमें व्यक्ति को मोबाइल पास न होने पर दुनिया में चल रही गतिविधियों के बारे में जानकारी न होने का डर सताने लगता हैै।

फेसबुक डिप्रेशन
अमरीकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स का मानना है कि साइबर बुलिंग या फेसबुक पर किसी तरह के कमेंट्स या लाइक, अनलाइक मिलने का प्रभाव युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। उम्मीद के अनुसार फेसबुक पर रिएक्शन न मिलने पर युवा डिप्रेशन में आने लगते हैं। साथ ही ऐसी वेबसाइट्स का लंबे समय तक इस्तेमाल करने पर यूजर्स की नींद व आत्म सम्मान के स्तर पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है।


फोन हेडेक्स
कई स्टडी में यह बात भी सामने आई है कि मोबाइल फोन और सिरदर्द में कनेक्शन होता है। फोन मैन्युफेक्चरर्स की ओर से हुई एक रिसर्च में यह पाया गया कि सोने से तुरंत पहले की गई चैट या कॉल नींद पर विपरीत असर डालती है। इससे अच्छी नींद नहीं आती और अगले दिन सिरदर्द जैसी समस्या का सामना करना पड़ता है। यह समस्या मोबाइल का इस्तेमाल करने वाले हर दूसरे व्यक्ति में देखी जा सकती है।

3डी हैंगओवर्स
अमरीकन एसोसिएशन ऑफ ऑप्टोमीटरिस्ट की एक स्टडी में 3डी से संबंधित टीवी व गेमिंग के साइड इफेक्ट्स पाए गए। स्टडी में 3डी देखने वालों पर ऑब्जर्वेशन किया गया और पाया गया कि लगातार 3डी देखने वालों में आंखों पर जोर पडऩा, साफ दिखाई न देना, सुस्ती व चक्कर आना, सिरदर्द और जी मिचलाना जैसी समस्या दिखाई दीं। इसके अलावा मोशन सिकनेस यानी यात्रा के दौरान जिनकी तबीयत खराब होती है उनमें 3डी कंटेंट की वजह से यह समस्या और बढ़़ जाती है।

इलेक्ट्रोमैग्नेटिक हाइपरसेंसिटिव
हम सभी वाई-फाई से लेकर मोबाइल फोन व अन्य वायरलेस कम्यूनिकेशन के साधनों के सिग्नल्स के घेरे में 24 घंटे रहते हैं। ऐसे में इनसे निकलने वाले इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड के संपर्क में हम लगातार रहते हैं और विभिन्न तरह की बीमारियों को न्योता देते हैं। सिरदर्द, त्वचा में जलन, मसल्स में दर्द जैसे लक्षण इस समस्या में खासतौर पर देखने को मिलती है।

इंटरनेट एडिक्शन
गेम, ईमेल और टेक्स्ट जैसी एक्टिविटीज के कारण ज्यादातर लोगों को इंटरनेट की लत लग गई है। यही वजह है कि जरा सा नेटवर्क से बाहर होते ही वे बेचैनी व डिप्रेशन महसूस करने लगते हैं।

हिकीकोमोरी
तकनीक से जुड़ी इस बीमारी में व्यक्ति खुद को सामाजिक रूप से काटकर तकनीकी दुनिया तक ही सीमित कर लेता है। एक अनुमान के अनुसार दो लाख युवा हिकीकोमारी से ग्रसित हैं। व्यक्ति खुद को कमरे तक भी सीमित रख लेता है और कई वर्षों तक ऐसी ही स्थिति में रह जाता है।

साइबरकॉन्ड्रिया
अपनी बीमारी के लक्षण को इंटरनेट पर ढूंढऩा और खुद को उस बीमारी से ग्रसित समझना। साथ ही सेहत से जुड़ी परेशानियों के बारे में पता लगाने की कोशिश करते रहना साइबर कॉन्ड्रिया बीमारी का लक्षण होता है।

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