कैंसर की चौथी स्टेज पर क्या है नई उम्मीद, जानें इसके बारे में

जिन मरीजों का कैंसर चौथी स्टेज पर पहुंच जाता है या ठीक होने के बाद वापसी कर लेता है, वे अक्सर जीने की उम्मीद खो देते हैं। ऐसे मरीजों के लिए हाई डोज कीमोथैरेपी वरदान साबित हो सकती है।

चौथी स्टेज को काबू करने के साथ यह कैंसर वापसी की आशंका को काफी हद तक कम कर देती है। इससे मरीज के जीवित रहने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। एसएमएस अस्पताल में अब तक इसके जरिए विभिन्न कैंसर के करीब 300 मरीजों का इलाज किया जा चुका है। हालांकि इसमें बेहद सावधानी की जरूरत है। अभी यह सुविधा देशभर के चुनिंदा सरकारी व निजी अस्पतालों में ही उपलब्ध है।

क्या है हाई डोज कीमोथैरेपी
सर्जरी के बाद बचे हुए कैंसर सेल्स को खत्म करने के लिए कीमोथैरेपी दी जाती है। इसमें इंजेक्शन के जरिए दवा देकर कैंंसर सेल्स को नष्ट किया जाता है। यह दवा इतनी गर्म होती है कि दुष्प्रभाव के कारण मरीज के सिर के बाल भी झड़ जाते हैं। हाई डोज कीमोथैरेपी में बीमारी की स्थिति के अनुसार दवा की डोज को 5 से 10 गुना तक बढ़ाकर दिया जाता है। ऐसे में संक्रमण, ब्लीडिंग, मुंह में छाले, डायरिया, लिवर व किडनी पर असर का खतरा हो सकता है। जान जाने का खतरा भी रहता है। इसलिए यह ट्रीटमेंट अनुभवी डॉक्टर से ही कराना चाहिए। रोग की गंभीरता व मरीज की स्थिति के आधार पर चिकित्सक यह थैरेपी 1 से 6 बार या उससे ज्यादा बार भी दे सकते हैं।

चौथी स्टेज समझें
जब कैंसर सेल्स एक स्थान से फैलकर किसी अन्य अंग में भी फैल जाते हैं तो इस स्थिति को बीमारी की चौथी स्टेज माना जाता है। मेडिकल भाषा में इसे मैटास्टैसिस कहते हैं।

दो तरह से होता है इलाज

1. डोज इंटेन्स थैरेपी...
ब्रेस्ट कैंसर व एक्यूट ल्यूकीमिया आदि में इसका प्रयोग होता है। इसमें मरीज की स्थिति के मुताबिक समय-समय पर कुछ थैरेपी देने से ही बीमारी नियंत्रित हो जाती है। उसे अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत नहीं पड़ती।

2. बोनमैरो ट्रांसप्लांट...
मल्टीपल मायलोमा व लिम्फोमा आदि में हाई डोज से कैंसर सेल्स के साथ शरीर में ब्लड बनाने वाले अच्छे सेल्स भी नष्ट होने का खतरा रहता है। इसलिए विशेषज्ञ थैरेपी से पहले ही मरीज के बोनमैरो से अच्छे सेल्स निकालकर सुरक्षित रख लेते हैं। इसमें सिर्फ एक बार हाई डोज दी जाती है। हाई डोज के दो दिन बाद उसके शरीर में अच्छे सेल्स दोबारा इंजेक्ट कर दिए जाते हैं जिससे शरीर में ब्लड बनना शुरू हो जाता है। इसे ही बोनमैरो ट्रांसप्लांट कहा जाता है। मरीज को किसी तरह की परेशानी न हो इसके लिए उसे डॉक्टरी देखरेख में 15 दिन से 1 माह तक अस्पताल में रहना पड़ता है।

इनमें है कारगर
हाई डोज कीमोथैरेपी सभी कैंसर में प्रयोग नहीं होती। यह ब्लड कैंसर जैसे एक्यूट लिंफोब्लास्टिक ल्यूकीमिया, एक्यूट मायलॉइड ल्यूकीमिया, बोन कैंसर जैसे ईविंग सारकोमा, ऑस्टियो सारकोमा, आंखों का कैंसर-रेटीनो ब्लास्टोमा व ब्रेस्ट कैंसर आदि में कारगर है।

70 की उम्र में इलाज संभव
थैरेपी से पहले ईको, पल्मोनरी फंक्शन, लिवर व किडनी आदि सभी जरूरी जांचें व वजन चेक किया जाता है। रिपोर्ट के आधार पर विशेषज्ञ तय करते हैं कि मरीज हाई डोज झेल पाएगा या नहीं। जांचें सामान्य होने पर 70 वर्ष के मरीज को भी यह थैरेपी दी जा सकती है।

संक्रमण से बचने के लिए बरतें सावधानियां

थैरेपी के दौरान प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने के कारण संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है इसलिए डॉक्टर इस बीच कुछ खास सावधानियां बरतने की सलाह देते हैं।

फूलों के नजदीक जाने से परहेज करें।
फल व कच्ची सब्जियां न खाएं।
मरीज को खानपान की चीजें अच्छे से पकाकर ही खाने को दें।
मिलने-जुलने के दौरान मुंह पर फेस मास्क का प्रयोग करें।
दांतों व मुंह की साफ-सफाई का विशेष खयाल रखें व भरपूर पानी पीएं।
बुखार आने या ब्लीडिंग होने पर तुरंत विशेषज्ञ से संपर्क करें।
तेज धूप, गर्म व सीलन वाले स्थानों पर न जाएं।
खाने से पहले व बाद में हाथ साफ रखें।

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