इस बीमारी में 90 फीसदी लोग डर के मारे बंद कर देते हैं खाना पीना

एलर्जी इम्युन सिस्टम का ओवर रिएक्शन होता है। इम्युन सिस्टम शरीर को बैक्टीरिया, फंगस और गंदगी से होने वाली परेशानियों से बचाने का काम करता है। जब वे इस प्रक्रिया में सही से काम नहीं कर पाता है तो उसकी परेशानी बढ़ जाती है। एलर्जी शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकती है लेकिन पांच अंगों को बुरी तरह प्रभावित करती है। ऐसे में समय रहते डॉक्टरी सलाह के साथ जरूरी जांच और इलाज कराने से बड़ी समस्या से बचा जा सकता है।


फूड एलर्जी में सावधानी
फूड एलर्जी आजकल की आम समस्या हो गई है। इसमें कुछ लोगों को गेंहू से बने उत्पाद जैसे आंटे से बनी रोटी या ब्रेड खाने पर परेशानी होने लगती है। इसी तरह दूध से बने उत्पादों को लेने के बाद उल्टी, घबराहट या बेचैनी होती है। इसको लेकर थोड़ी सावधानी बरतनी चाहिए। किसी भी खाद्य पदार्थ के खाने या पीने से एलर्जी की समस्या है तो सबसे पहले डॉक्टर को दिखाएं और एलर्जी टैस्ट कराएं। बिना जांच रिपोर्ट और डर से खाना पीना नहीं छोडऩा चाहिए। इसमें की गई जल्दबाजी शरीर को कई तरह के जरूरी पोषक तत्त्वों से दूर कर देती है जिससे शरीर कमजोर होता है। जिस भी खाद्य पदार्थ के प्रयोग से गंभीर समस्या हो रही है तो डॉक्टरी सलाह पर ही छोड़ें।



शरीर के पांच हिस्से होते प्रभावित
एलर्जी की वजह से शरीर के पांच प्रमुख हिस्से प्रभावित होते हैं। इसमें नाक की एलर्जी प्रमुख है। इसमें छींक के साथ नाक से पानी आना, नाक बंद हो जाना, नाक के अंदर खुजली होती है। मेडिकली इसे एलर्जी राइनाइटिस कहते हैं। गले की एलर्जी होने पर खांसी, सांस लेने में तकलीफ, खिचखिच और गले में दर्द की तकलीफ होती है। सांस संबंधी 80 फीसदी परेशानियां जैसे अस्थमा एलर्जी से होती है। इसमें सांस फूलने के साथ सांस लेने में तकलीफ होती है और कई बार सांस अटकने लगती है। इसी तरह स्किन एलर्जी में शरीर के अलग-अलग भागों पर लाल चकत्ते पडऩे लग जाते हैं जिसे मेडिकली एलर्जी डर्मिटाइटिस कहते हैं। इसमें त्वचा पर खुजली रहने के साथ उसमें जलन भी होती है धीरे-धीरे इनका फैलाव तेजी से बढ़ता है।
दो तरह की होती है एलर्जी
एलर्जी दो तरह की होती है। पहली सीजनल एलर्जी जिसके होने का कारण परागकण होते हैं। नए उगने वाले पेड़ पौधों और फूलों की खुशबू से परेशानी शुरू होती है। दूसरी तकलीफ गंदगी या धूल से होती है। इसमें घर में रखे पुराने रजाई-गद्दे, किताबों और दूसरे अन्य सामान जिसमें डस्ट चिपकी होती है। डस्ट सांस के जरिए नाक के भीतर जाती है जिससे लगातार छींक आना और आंखों से आंसू आने लगता है। इसी तरह फ्लैट में रहने वाले लोगों के घरों में सीलन की समस्या रहती है। सीलन से फंगल एलर्जी होती है जिससे बचने के लिए कोशिश यहीं करनी चाहिए कि सीलन से दूर रहें। जहां सीलन है उसे ठीक कराएं क्योंकि उसकी महक स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का कारण बनती है।
ऐसे करते हैं एलर्जी टैस्ट
एलर्जी के लक्षण दिखने और लगातार दवा लेने के बाद भी आराम नहीं मिलता है तो जांच करवाते हैं। जांच की मदद से उस एलर्जन का पता किया जाता है जो शरीर की आईजी एंटीबॉडी को प्रभावित करता है। इसको जानने के लिए सबसे पहले स्किन प्रिक टैस्ट करते हैं। इसमें एलर्जन को बॉडी पर टच करते हैं। तकलीफ होगी तो शरीर की आईजी एंटीबॉडी रिएक्ट करेगी और लाल रंग का धब्बा उस जगह बन जाएगा। त्वचा खराब है। लगातार दवा खा रहे हैं तो ये टैस्ट नहीं हो सकता है। दवा तीन दिन बंद रखने के बाद ही ये जांच संभव है। दूसरा ब्लड टैस्ट है जिससे एलर्जन को डिटेक्ट करते हैं। इन दोनों टैस्ट रिपोर्ट और मरीज की पुरानी हिस्ट्री जानने के बाद उसका मिलान करते हैं। दोनों अगर आपस में मिलते हैं तभी रोगी को बचाव के लिए सलाह दी जाती है।



इम्युनोथैरेपी भी काफी कारगर
एलर्जी की समस्या काफी गंभीर है तो इम्युनौथैरेपी से रोगी का इलाज करते हैं। इसमें एलर्जन को शरीर में इंजेक्शन या ड्रॉप की मदद से दवा पहुंचाते हैं। इससे रोगी को आराम मिलता है। इसके साथ ही जिस चीज से एलर्जी है उससे बचाव ही उसका इलाज है। धूल से एलर्जी है और कोई काम कर रहे हैं तो मुंह पर कपड़ा बांधकर रखें। खाने पीने की किसी चीज से एलर्जी है तो उसके इस्तेमाल से बचना चाहिए। यही इसका बेहतर इलाज है।


रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं


एलर्जी कई तरह की होती है और हर व्यक्ति को अलग-अलग तरह की परेशानी होती है। ऐसे में रोगी की स्थिति और उसकी परेशानी को देखने के बाद पहले रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की दवा देते हैं। इसके बाद रोग को ठीक करने की दवाएं चलती हैं। एलर्जी की समस्या आनुवांशिक है तो बच्चे के जन्म के बाद उसे विशेष तरह की दवाएं देते हैं जिसके बाद उसे कोई परेशानी नहीं होती है। रोगी की परेशानी और उसके खानपान के बारे में जानने के बाद दवा तय करते हैं।

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